छतरपुर कलेक्टर का ‘दूरबीन नेटवर्किंग’ मॉडल और किसान का ‘धर्म-संकट’

चंदला विधानसभा, जिला छतरपुर (म.प्र.)

भारी अतिवृष्टि, नेटवर्क की आपदा और प्रशासनिक-राजनीतिक मौन

छतरपुर जिला मुख्यालय के एक वातानुकूलित और भव्य कक्ष में बैठकर जब साहब जिले का मानचित्र देखते होंगे, तो चंदला विधानसभा का दूरदराज का गांव उन्हें मानचित्र के कोने में किसी सूक्ष्म बिंदु सा दिखाई देता होगा। जिला मुख्यालय से 90 से 120 किलोमीटर की दूरी कोई साधारण दूरी तो है नहीं—यह वह दूरी है जिसे पार करने में प्रशासनिक मशीनरी के टायरों की हवा निकल जाती है और साहब का हाई-टेक ‘प्रशासनिक नेटवर्क’ बफरिंग मोड में चला जाता है।

चंदला विधानसभा केवल आम विधानसभा क्षेत्र नहीं है, इसका अपना एक ‘वीआईपी’ रुतबा है। आखिर राज्य सरकार में राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार जी का गृह क्षेत्र जो ठहरा! लेकिन साहब, सत्ता की चमक और मुख्यालय की दूरी के बीच चंदला का किसान एक अद्भुत ‘प्रशासनिक ग्रहण’ का शिकार हो चुका है।

हाल ही में हुई अतिवृष्टि ने किसानों के खेतों को झीलों में तब्दील कर दिया है। फसलें पानी पर तैर रही हैं और किसानों की उम्मीदें डूब चुकी हैं। नियम-कानून कहते हैं कि कलेक्टर पूरे जिले का सर्वेसर्वा होता है, उसका नेटवर्क इतना विशाल होता है कि जिले की हर धड़कन मुख्यालय तक पहुंचती है। पटवारी से लेकर तहसीलदार, और ग्राम पंचायत सचिव से लेकर राजस्व अधिकारियों की पूरी की पूरी फौज इसी नेटवर्क का हिस्सा होती है। लेकिन चंदला के मामले में शायद छतरपुर कलेक्टर महोदय का यह नेटवर्क ‘ऑउट ऑफ कवरेज एरिया’ बता रहा है।

दूरी का ऐसा खौफ है कि 100 किलोमीटर की सड़क तय करके चंदला के गांवों तक सर्वे टीम का पहुंचना मानो किसी अंतरिक्ष मिशन को अंजाम देने जैसा हो गया है। जब कोई अधिकारी ही नहीं पहुंच रहा, तो सर्वे का कागज बनना तो दूर की बात है। किसान आसमान की तरफ देखकर रो रहा है और प्रशासन कागजों में ‘सब कुशल-मंगल’ की रिपोर्ट तैयार करने में व्यस्त है।

दुखों का पहाड़ यहीं खत्म नहीं होता। एक तरफ अतिवृष्टि की मार है, तो दूसरी तरफ बोवनी के लिए खाद की मारामारी। खाद की एक बोरी की कीमत क्या है? महज ₹2100! और यह कीमत चुकाने के बाद भी खाद पाना ऐसा ही है जैसे किसी तपस्वी को बरसों की कठोर तपस्या के बाद भगवान से साक्षात वरदान मिल गया हो। लंबी-लंबी कतारें, पुलिस की लाठियां और दिन-रात की मेहनत के बाद अगर खाद की एक बोरी मिल जाए, तो किसान खुद को किसी विजेता से कम नहीं समझता।

यहाँ का गरीब और अशिक्षित किसान प्रशासनिक फाइलों में ‘आपदा प्रबंधन कानून’ की धाराएं खोजने में असमर्थ है। अपनी बात मजबूती से कहने की कला उसे आती नहीं, और हक मांगने की आवाज गले में ही घुटकर रह जाती है। वह तो बस खेत की मेढ़ पर बैठकर यह सोचता है कि जो फसल पानी में तैर रही है, उसका मुआवजा मांगने के लिए अर्जी किस साहब के पैरों में डालनी होगी।

ऐसे समय में अमूमन ‘किसान संगठन’ मसीहा बनकर सामने आते हैं। लेकिन चंदला में मामला थोड़ा अलग है। जिले में जो बड़े किसान संगठन सक्रिय हैं—जैसे सत्तारूढ़ दल से जुड़ा ‘भारतीय किसान मोर्चा’—वे इस समय एक बहुत बड़े ‘नैतिक और राजनीतिक धर्म-संकट’ से गुजर रहे हैं। किसान मोर्चा के नेताओं की स्थिति उस भक्त जैसी हो गई है जो भगवान से मन्नत तो मांगना चाहता है, लेकिन डरता है कि कहीं भगवान नाराज न हो जाएं! अब भला अपनी ही सरकार, अपने ही जिले के कलेक्टर और अपने ही इलाके के मंत्री के खिलाफ नारेबाजी कैसे की जाए? अगर किसान मोर्चा चंदला के पीड़ित किसानों के लिए सड़क पर उतरकर सर्वे कराने की मांग करता है, तो यह माना जाएगा कि वे अपनी ही सरकार का ‘नेटवर्क फेल’ होना स्वीकार कर रहे हैं। नतीजा यह है कि संगठन के झंडे गाड़ियों पर चमचमा रहे हैं, लेकिन उन झंडों के नीचे किसानों का दर्द पूरी तरह गायब है।

कलेक्टर साहब के पास जिला चलाने के लिए इतने सैटेलाइट, वायरलेस और डिजिटल संसाधन हैं कि वे चाहें तो छतरपुर में बैठकर भी हर गांव का जायजा ले सकते हैं। परंतु अतिवृष्टि से तबाह हुए चंदला के किसानों का दर्द शायद इतना बारीक है कि वह उनके हाई-डेफिनिशन नेटवर्क स्क्रीन पर जूम-इन ही नहीं हो पा रहा।

चंदला के किसानों को अब यही सलाह दी जा सकती है कि वे अपनी डूबी हुई फसलों के फोटो खींचकर छतरपुर कलेक्टर कार्यालय की ओर कबूतरों के जरिए भिजवाएं या फिर मुख्यालय की तरफ मुंह करके जोर-जोर से चिल्लाएं, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक प्रशासनिक नेटवर्क 100 किलोमीटर की दूरी तय करते-करते पूरी तरह फेल हो चुका है और किसान संगठनों की जुबान पर राजनीति का ताला लग चुका है।

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